बाबाजी न्यूज़ रायपुर __ जब पंचायत प्रतिस्पर्धा बन जाए और नैतिकता हारने लगे
आज समाज के सामने एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर उभरकर आ रही है — सिंधी पंचायत और महापंचायत एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगी हैं। यह प्रतिस्पर्धा स्वस्थ नहीं, बल्कि सत्ता, वर्चस्व और प्रभाव दिखाने की होड़ बन चुकी है। दुखद बात यह है कि इस होड़ में नैतिक मूल्य, समाज की एकता और आपसी सम्मान पीछे छूटते जा रहे हैं।
पंचायतों की स्थापना समाज को जोड़ने, विवाद सुलझाने, संस्कृति की रक्षा करने और सामूहिक हित में निर्णय लेने के लिए हुई थी। लेकिन आज वही संस्थाएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने, आरोप-प्रत्यारोप करने और प्रभाव जमाने की राजनीति में उलझती दिखाई दे रही हैं। यह स्थिति केवल संस्थाओं की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साख को कमजोर कर रही है।
जब एक पंचायत दूसरी को गिराने की कोशिश करती है, तो उसका सीधा असर समाज के आम लोगों पर पड़ता है। लोगों में भ्रम पैदा होता है, विश्वास टूटता है और सामाजिक एकता दरकने लगती है। जो मंच समाज को दिशा देने वाला होना चाहिए था, वही मंच आज विवाद और टकराव का अखाड़ा बनता जा रहा है।
प्रतिस्पर्धा अगर विकास और सेवा की भावना से हो तो समाज आगे बढ़ता है। लेकिन जब प्रतिस्पर्धा अहंकार, बदले की भावना और सत्ता की लालसा से प्रेरित हो जाए, तब वह विनाश का कारण बनती है। पंचायतें एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए कार्यक्रमों की संख्या, भीड़, प्रचार और प्रभाव का प्रदर्शन तो कर रही हैं, लेकिन समाज के मूल मुद्दे — शिक्षा, संस्कार, युवा दिशा, सामाजिक सुधार — पीछे छूटते जा रहे हैं।
आज जरूरत है आत्ममंथन की। पंचायतों को यह समझना होगा कि वे प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि समाज निर्माण की साझेदार संस्थाएं हैं। यदि दोनों मिलकर काम करें, तो सिंधी समाज की पहचान और शक्ति कई गुना बढ़ सकती है। लेकिन अगर यह टकराव जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें विभाजन और स्वार्थ की विरासत ही याद रखेंगी।
नैतिक मूल्यों से ऊपर कोई भी संस्था नहीं हो सकती। सम्मान, संवाद, संयम और सहयोग — यही किसी भी सामाजिक संगठन की असली ताकत होती है। पंचायतों को चाहिए कि वे व्यक्तिगत या संगठनात्मक अहंकार से ऊपर उठकर समाज हित को प्राथमिकता दें।
समाज को जोड़ने वाले हाथ जब एक-दूसरे को गिराने लगें, तो गिरावट केवल संस्थाओं की नहीं, पूरे समाज की होती है। अब समय है कि हम चेतें, संवाद करें और प्रतिस्पर्धा को सहयोग में बदलें — तभी सिंधी समाज सशक्त, संगठित और सम्मानित बन सकेगा। आप सभी से अनुरोध है कृपया सभी अपनी अपनी राय जरूर दे



